संत कबीर दास की जयंती पर एक विशेष संस्मरण

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कबीर दास एक गरीब व्यक्ति थे। उनका काम था करघे पर कपड़ा बुनना। यही उनकी आय का माध्यम था। कबीर का लोई से विवाह हो गया। कबीर ने विवाह में ना काजी को बुलाया और ना तो मुल्ला को बुलाया जिनकी समाज में खूब चलती थी। इन सभी लोगों ने आपस में सलाह मशविरा करके कबीर के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने का निश्चय किया। किसी ने कहा कि कबीर बेशर्म हो गया है वह न तो दंड देगा और बिरादरी को भोज ही देगा। इसलिए इस मनबढ़ लौंडे को बिरादरी की बाहर का रास्ता दिखाया जाना जरूरी हो गया है। नहीं तो मुल्ला और काजी का समाज में प्रभाव खत्म हो जाएगा। आपस में मशविरा करने के बाद काजी और मुल्ला,लोगों के साथ बड़ी तादाद में कबीर के घर बिना बुलाए पहुंच गए। और चिल्लाने लगे। कि कहां है काफिर, कबीर घर पर है क्या ? उसे बाहर निकालो क्यों घर में बैठा है? कबीर उस समय घर पर कपड़ा बुन रहे थे और उनकी पत्नी लोई उनकी मदद कर रही थी। शोर- गुल सुनकर कबीर खुद बाहर आए और बोले, क्या बात है? बिरादरी के लोगों ने और साथ में कई और लोगों ने भी कहा- तुम्हें इस तरह हाथ पकड़ो विवाह करने का क्या हक था? ना तो काजी को बुलाया ना मुल्ला को बुलाया। बिरादरी को भोज भी नहीं दिया। हम लोग इस विवाह को नाजायज करार देते हैं। कबीर ने शांतिपूर्वक कहा कि हमने विवाह लोई से किया और लोई ने हमसे किया है।हम लोगों ने यह सब अपनी रजामंदी से किया। विवाह का मतलब तो हम दोनों से है और हम रजामंद हैं आप लोगों को उसे जायज और नाजायज ठहराने का क्या हक है ? रही खातिर तवजों और भोज की बात तो आप सभी लोग सुन ले, हम गरीब आदमी हैं मेरे पास दावत में खिलाने के लिए ना पैसा है ना तो इस तरह का बेकार काम कर्ज लेकर ही मैं करूंगा । कर्ज लेकर दावत जैसी फिजूल खर्ची करना गुनाह है और मैं यह गुनाह कभी नहीं करूंगा। मैं जानता हूं कि अगर मेरा विवाह नाजायज भी होता तो दावत देने से वह जायज हो जाता। मेरा विवाह तो 16 आने जायज है तो आपसे विवाह का प्रमाण पत्र लेने कि मुझे जरूरत कतई नहीं है आप लोगों की मर्जी, जो चाहे करें। आप लोगों की तो यही कमजोरी है कि पुराने सड़े गले रीति- रिवाजो को अपनाए चले जा रहे हैं। इस रिवाज को पूरा करने के लिए कर्ज लेते हैं और उसको अदा करते-करते मर जाते हैं। पूरी जिंदगी ना ऐसे लोगों को कायदे से पेट की रोटी मिलती है और न तन का कपड़ा। जो कबीर को जाति से बाहर करने आए थे उन्हीं में से कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया कि कबीरवा तो ठीक बात कह रहा है। बात तो सही है इसलिए अब छोड़िए। यह साधु संत हो गया है। और बिरादरी के लोग इस घटना के बाद कबीर को कबीरदास कहने लगे।

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