माध्यमिक शिक्षा बोर्ड में दुर्व्यवस्था क्यों ?

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जौनपुर: उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अपर सचिव कार्यालय में एक उपसचिव सरोज कुमार दुबे ने निजी वार्ता के दौरान तीसरी आंख को बताया कि – 
गंगा जब गंगोत्री से ही मैली हो जाती है तो मैदान में शुद्धता कैसे संभव है?
जहां तक ईमानदारी और नैतिक आचरण का संबंध है आप लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही देख लीजिए। ऐसे ऐसे महापुरुष हैं जिन्हें तिहाड़ में काफी समय बिताने के बावजूद भी शर्म नहीं आती। यह लोक सभा और विधानसभा देश और प्रदेश की सबसे बड़ी पंचायत है।  यहां की स्थिति ऐसी है जो आप किसी  विभाग के कर्मचारी और अधिकारी से अनुशासन की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? फिर – बच्चे तो बच्चे हैं वह नकल करेंगे ही।
आपने बताया कि जो हाईस्कूल और इंटरमीडिएट कक्षाओं की मान्यता के लिए यह लोग औपचारिकता पूर्ण करके ऑफिस जाते हैं तो इनको देखा जा सकता है ये बिल्कुल अच्छे माफिया की तरह दिखलाई पड़ते हैं।

  औपचारिकता पूर्ण करने के बाद मान्यता लेकर के चले आते हैं। यह तो इंटरमीडिएट की बात है ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज की मान्यता के लिए ऐसे ही माफिया बैठे हुए हैं।  आप कैसे उम्मीद करते हैं कि आने वाली जो फसल है यह बहुत अच्छी होगी।
जिसे शिक्षा प्रशासन में नौकरी करना है पुलिस के सहयोग से सब कर लेता है। ऐसे प्रबंधकों के कॉलेज में नकल बंद हो जाए यह मुमकिन नहीं है ऐसे ही बड़े-बड़े आयोग में भी होता है जहां से देश और प्रदेश को चलाने वाले अधिकारी निकलते हैं। 
संवेदनशील और अतिसंवेदनशील वर्ग बना करके, कुछ पुलिस व्यवस्था करके यह इंटरमीडिएट तक की परीक्षा कराई जाती है। भारतीय लोकतंत्र में अनुशासनहीनता दिल्ली से ही शुरू हो जाती है।
सरोज कुमार ने अपने यहां की एक मान्यता के बारे में बताया कि उन दिनों प्रदेश की मुख्यमंत्री एक तेज – तर्रार  महिला थी। सत्ता पक्ष के एक माफिया किस्म के विधायक बोर्ड ऑफिस आए और कागजातों की पूर्ति करके पत्रावली संबंधित अधीक्षक को देकर के आदेशात्मक स्वर में बोले कि मैं विधायक हूं। यह मान्यता तत्काल हो जानी चाहिए। अधीक्षक ने कहा कि शर्ते पूर्ण करके जाइए नहीं तो पत्रावली पर विचार नहीं होगा। उन्होंने कि –  लगता है कि आप लोगों को ठीक ही करना होगा। वे नाराज होकर सीधे  मुख्यमंत्री के पास चले गए और जब मुख्यमंत्री के यहां से लौटे तो बिल्कुल संत हो गए थे।  उन्होंने मान्यता की सब कार्यवाही पूरी किया। क्षतिपूर्ति भी दिया और उन्हें मान्यता भी मिली। यह काम आज तो डंकी की चोट पर हो रहा है पहले थोड़ा लाज – शर्म के साथ होता रहा। 
यह वर्तमान लोकतंत्र की देन है सिस्टम से चलिए अन्यथा आपका छोटा से छोटा काम भी नामुमकिन है।

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