नवरात्रि में श्री दुर्गा सप्तशती का विशेष महत्व

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मुख्य संपादक – श्याम नारायण पांडेय

श्री दुर्गा सप्तशती कहने से ऐसा प्रतीत होता है कि श्री दुर्गा मां के मार्कंडेय पुराण में वर्णन किया हुआ 700 श्लोक का पाठ ही मुख्य उपासना से संबंधित है। सप्तशती का अभिप्राय मात्र इतना ही नहीं है बल्कि सप्तशती की पाठ विधि के अनुक्रम को देखा जाए तो पवित्रीकरण से लेकर आरती तक बहुत सारे कार्यक्रम है जिनका संपूर्ण पाठ और जप करने से ही दुर्गा सप्तशती के पाठ का लाभ मिलता है।

अब विशेष रूप से कैसे क्या करना चाहिए यह ग्रंथों में दिया गया है। खटकर्म के उपरांत वैदिक मंत्रों के उपचार संबंधी विनियोग के बाद दुर्गा देवी के कवच अर्गला और कीलक संबंधी कुल 94 श्लोको में मार्कंडेय पुराण में दुर्गा जी के यश और गुड़ का वर्णन किया गया है।

दूसरे क्रम में वेदोक्त रात्रि सूक्त में उपासना संबंधी ऋग्वेद की आठ ऋचाओं तथा तंत्रोक्त रात्रि सूक्त में कुल 15 श्लोक हैं।
दैविक अथर्व शीर्ष में कुल 26 मंत्र हैं।

न्यास, ध्यान सहित नवार्ण मंत्र का जप किया जाता है। इसलिए नवार्ण मंत्र जप दुर्गा सप्तशती के प्रथम और अंत में इस प्रकार किया जाता है कि ऐसा लगे कि दुर्गा सप्तशती का पाठ नवार्ण मंत्र से संपुटित हो चुका है।

अब इसके बाद शत सप्तशती के 13 अध्याय में 700 श्लोको का पाठ होता है। इसके बाद अब वैदिक देवी सूक्त और तांत्रिक देवी सूक्त का पाठ होता है।
इसके बाद प्रधानिक, वैकृतिक् और मूर्ति रहस्य का पाठ होता है।

अंतिम क्रम में देवी का क्षमा अपराध स्तोत्र फिर सिद्ध कुंजिका स्तोत्र के पश्चात आरती की जाती है अब दुर्गा सप्तशती का पाठ संपूर्ण हुआ।

इस अनुष्ठान में केवल उपर्युक्त उपासना संबंधी अनुष्ठान ही पर्याप्त नहीं होता बल्कि व्यक्ति का खान-पान, रहन-सहन और आचरण भी अति महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यदि आप दुर्गा पूजन में विधि और विधान का ध्यान नहीं देते तो सारा श्रम बेकार हो जाता है इसलिए बिल्कुल पवित्र होकर के मां दुर्गा की उपासना ही सबके लिए फलदाई होती है।

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