यह कैसा जौनपुर महोत्सव? – आज़म ख़ान

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उत्तर प्रदेश के जनपदों में महोत्सव मनाए जाने की परंपरा सी बन रही है किंतु औचित्य समझ में नहीं आता?आखिर यह महोत्सव किस खुशी में मनाया जा रहा है? कौन सी उपलब्धि हो गई?

यह विचार समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता आजम खान ने एक भेंट में व्यक्त किया। आपने सरकार के मुखिया से सवाल किया कि क्या प्रदेश के जनपदों के देहात क्षेत्रों में रह रही सर्वाधिक आबादी वाला कृषक वर्ग खुशहाल हो गया है? उस समय पर बीज खाद समय पर मिल रहा है? फसलों की सुरक्षा के लिए छुट्टा पशु बनैले सूअरों,शाही, आदि से मुक्ति का इंतजाम पूरा हो गया है? किसानों के मुकदमों के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था हो गई है।

इसके साथ आपने यह भी कहा कि आज भी ढाड़ – मेड वसीयत, तरमीम, आदि में वादकारियों को वर्षों दौड़ाया जाता है। कहीं गांव चकबंदी में आ गया है तो दस, दस, बीस- बीस वर्ष तक मुकदमों का फैसला नहीं होता। तहसील से लेकर दीवानी अदालतों तक का चक्कर लगाते- लगाते लोग थक जाते हैं।

पुलिस और अदालती कार्रवाई के त्वरित निस्तारण की व्यवस्था न होने के कारण ग्रामीण लोगों की परस्पर दुश्मनी वर्षों ही नहीं, कई पुश्त चलती है। आश्चर्य यह है कि कहीं किसी भी दफ्तर में किसी अधिकारी की जवाबदेही तय ही नहीं है। उन्होंने कहा कि घूसखोरों की परंपरा दिनों – दिन बढ़ रही है। प्रदेश के जनपदों में गांव प्रधान, नगर पंचायत के प्रधान और नगर पालिका के अध्यक्षों की अपनी मनमानी तो चल ही रही है। शिकायती प्रकोष्ठ बने हुए हैं किंतु वे सब निरर्थक हैं। कभी किसी चोर या घूसखोरी अधिकारी को दंड मिलते नहीं देखा गया।

गांव में विकास के लिए सरकार की मनरेगा योजना जरूर चल रही है किंतु यह प्रधानों के लिए बहुत ही मुफीद हो रही है। गांव में काम तो है नहीं है। कागज पर कार्य दिखला करके पैसा निकाल दिया जाता है। थोड़ा बहुत जॉब कार्ड धारकों को दे दिया जाता है। थोड़ा-थोड़ा ऊपर वितरित हो जाता है इसलिए शिकायत का कोई अर्थ नहीं रह जाता। शिकायत दब जाती है। प्रधान, क्षेत्र पंचायत सदस्य, जिला पंचायत सदस्य, ब्लाक प्रमुख, विधायक और सांसद सभी तो जनहित के लिए ही अच्छा वेतन और भत्ता ले रहे हैं किंतु कभी किसी ने जमीन पर कुछ किया हो, ऐसा देखा नहीं गया। ऐसी खराब दशा के चलते किसान तबाह हो रहे हैं जो खेती बाड़ी में पैसा खर्च होता है। उतना भी नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में महोत्सव का क्या अर्थ है? मात्र नाच- गाने में शासन के पैसों की बंदरबांट के अलावा और कोई जनहित तो दिखाई नहीं पड़ता।

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