राम जनम कर हेतु अनेका, परम विचित्र एक ते एका – पं. वशिष्ठ नारायण उपाध्याय

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श्याम नारायण पाण्डेय

जौनपुर । श्री शंकर आदर्श ग्रामोदय बालिका विदयालय इमलो पांडेय पट्टी के प्रांगण में शिव मंदिर पर विगत 14 वर्षों से चल रही राम कथा में पधारे मानस मर्मज्ञ पण्डित वशिष्ठ उपाध्याय पहले दिन के कथा क्रम को आगे बढाते हुए माँ पार्वती के प्रश्न का उत्तर भगवान शिव द्वारा दिया गया बताया । विद्द्वान व्यासने सर्व प्रथम भगवान के अवतार के कारणों की चर्चा करते हुए बताया कि जब जब धर्म की ग्लानि होती और असूरों का आतंक बढ़ता है सज्जनो पर आतंकवादी शक्तियों का प्रहार होता है । तब तब ईश्वर का विविध रूपों में अवतार होता है और वे राक्षसी शक्तिओ का विनाश कर सज्जनो के कष्ट का शमन करते है ।

भगवान राम के अवतार के कारणों की व्याख्या करते हुए विद्द्वान व्यास ने बताया कि प्रथम तो स्वयंभू मनु और शतरूपा की कठिन तपस्या के पश्यात जब उन्हें ईश्वर ने चतुर्भुज रूप में दर्शन देकर वरदान मांगने को कहा तो पति पत्नी दोनों ने याचना किया कि

” चॉहउ तुमहहि समान सूत “

 ईश्वर ने तथास्तु कहकर वरदान दे दिया । दूसरा कारण नारद का श्राप था । जब नारद ने शक्ति निधि राजा की पुत्री विश्वमोहिनी से विवाह करना चाहा और प्रभु ने रोक दिया । उस समय कामासक्त नारद ने  भगवान को बहुत ही बुरा भला कहते हुए श्राप दिया कि जिस प्रकार नारी विरह में मैं  दुखी हो रहा हूँ उसी तरह आपकी भी हालत होगी । और वही बन्दर की आकृति अर्थात बन्दर आपकी सहायता करेंगे । 

इसके बाद विद्वान व्यास उपाध्याय जी ने बताया कि राजा प्रताप भानु को ब्राह्मणों ने श्राप दिया कि आपका समूल नाश हो जाये और अगली योनि में तुम्हारा जन्म राक्षस कुल में हो । जब यह मालूम हुआ कि प्रताप भानु निर्दोष है तो तब ब्राह्मणों ने श्राप में सुधार दिया कि तुम्हारी मृत्यु भगवान के हाथ से होगी और तुम्हें सपरिवार मुक्ति मिलेगी ।


आपने तीसरे दिन राम के अवतार की कथा कही जब मां कौशल्या को क़भी कभी उन्हें अपना रूप दिखाकर बताना पड़ा कि मोह माया मे वे न पड़े । रामावतार की व्याख्या करते हुए बताया कि राम -मार्यादा पुरुषोत्तम है परिवार में सम्बन्धो की रक्षा मर्यादा की रक्षा कैसे होनी चाहिए आपने अपने जीवन में निर्वाह करके बताया ।

व्यास जी ने कहा कि जहाँ द्वापर में अपने भाइयों के सम्बंध में दुर्योधन घोषणा करता है कि —

” सूच्यग्रम न दास्यामि
विना युद्धेन केशवः”

वही ज्योहीं महाराज दशरथ द्वरा महारानी कैकेयी को राम को चौदह वर्ष के वनवास और भरत कौशल का राज्य दिए जाने के वरदान के बारे में राम ज्यो ही सुनते हैं। वलकल वस्त्र धारण कर तुरंत वन को प्रस्थान करते हैं। माँ ज्यो ही इस प्रसंग को सुनती हैं , वे कहती हैं जौं पितु मातु कहेउ वन जाना, तौ कानन सत अवध समाना । यह पति और छोटी रानी के वचन को पूर्ण किये जाने के लिए राम को बड़ी रानी का आदेश और परिवार की मर्यादा हैं। भाइयों में प्रेम का ऐसा आदर्श तो भारतीय साहित्य में नहीं देखा जाता। भरत जब नन्हीहाल से आकर जब पिता के मरण और राम के वन गमन का दुःखद समाचार सुनते हैं।तब पिता के श्राध्द आदि सम्पन करने के बाद विन्रम भाव से गुरु वशिष्ठ औऱ माँ कौशल्या के आदेश को अस्वीकार कर देते हैं।अयोध्या की प्रजा, सभी माताओं औऱ गुरु वशिष्ठ को साथ लेकर अभिषेक सामग्री के साथ राम को मनाने चित्रकूट चले जाते हैं। वे कहते हैं- देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाई। यही आज के समाज के लिये आदर्श हैं।

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