जौनपुर। आज भी मुद्रण माध्यम की महत्ता और विश्वसनीयता पूर्ववत बनी हुई है। वह आज भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना पहले था। दशकों से त्वरित सूचना देने और खबरों को सचित्र परोसने के बावजूद इलेक्ट्रॉनिक माध्यम आम जनता का विश्वास प्राप्त नहीं कर पा रहा है। सोशल मीडिया भी शोहरत की बुलंदी पर है किंतु खबरों की सत्यता के नजदीक नहीं पहुंच पा रहा है। सनसनी फैलाकर झूठी खबरों को प्रस्तुत कर वाह वाही लूटने में सोशल साइट का कोई जोड़ नहीं है लेकिन आज भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जन विश्वास नहीं प्राप्त कर पा रहा है।
यह विचार जनपद के वरिष्ठ पत्रकार और मूर्धन्य साहित्यकार डॉ० देवेंद्र उपाध्याय ने व्यक्त किया।
आप अपने आवास (रेहटी- नेवादा) पर स्थानीय न्यूज़ चैनल तीसरी आंख के संपादक श्याम नारायण पांडे से वर्तमान समय में पत्रकारिता पर अपना विचार व्यक्त कर रहे थे।
अपने समय की पत्रकारिता के बारे में आपने कहा कि- उस वक्त कुछ ही लोग पत्रकारिता क्षेत्र में थे। वर्ष 1930, 1940, 1950 और 1960 के दशक में बाबूरामेश्वर प्रसाद सिंह, पंडित अभयजीत दुबे एवम् ठाकुर गजराज सिंह मात्र तीन ही व्यक्ति पत्रकार थे। ये तीनों लोग स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे। बाबूजी 1920 से हिंदी साप्ताहिक “समय” का प्रकाशन कर रहे थे, पंडित अभयजीत दुबे वाराणसी से प्रकाशित अखबार “आज” के संवाददाता थे और ठाकुर गजराज सिंह हिंदी साप्ताहिक अख़बार “प्रकाश” का संपादन कर रहे थे। इन तीनों लोगों ने अपने जीवन का स्वर्णिम काल जेल में ही बिताया। पत्रकारिता तो ये लोक- जागरण के लिए कर रहे थे।
दूसरी पीढ़ी में भी कम ही लोग पत्रकार थे जिनमें रमाशंकर लाल संवाददाता- “नेशनल हेराल्ड” , चंद्रेश मिश्रा संवाददाता- “आज”, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव संवाददाता- “नॉर्दन इंडिया” पत्रिका, पुरुषोत्तम सिंह संपादक- साप्ताहिक “जौनपुर संदेश” और दिनेश कुमार सिंह उर्फ (दम्मू जी) संपादक- “समय” थे इनके साथ ही डॉक्टर देवेंद्र उपाध्याय हिंदी साहित्य के मुर्धन विद्वान होने के साथ-साथ “हिंदी दैनिक जानवार्ता” (वाराणसी) के विशेष संवाददाता थे।
इसके साथ पंडित तीर्थराज तिवारी संवाददाता- “पीटीआई”, पंडित त्रिलोकी नाथ मित्र संवाददाता- “स्वतंत्र भारत” और यादवेन्द्र दत्त चतुर्वेदी संवाददाता – “सन्मार्ग” के मान्यता प्राप्त पत्रकार और शासकीय अधिवक्ता भी थे।
यह सभी लोग उच्च शिक्षा प्राप्त समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति थे उनके लेखन पर कभी किसी ने उंगली नहीं उठाया। कोई भी खबर घटना स्थल पर जाकर विधिवत जानकारी लिए बिना लिखी नहीं जाती थी। इनकी जवाबदेही आम जनता के प्रति ज्यादा थी। खबरों में सत्यता की प्रमुखता का ध्यान रखा जाता था। आज की तरह सुनी – सुनाई खबरों का कोई स्थान नहीं था। वह वक्त था जब एक कालम की छोटी-छोटी खबरें भी बड़े अधिकारियों के आंख की किरकिरी बन जाती थी।
डॉ० देवेंद्र ने कहा कि- आज जौनपुर से 100 के लगभग अख़बार प्रकाशित हो रहे हैं और सैकड़ो पत्रकार भी हैं। नित्य – प्रति समाचार भी लिखा जाता है।
स्वयं लिखते हैं और स्वयं ही पढ़ते हैं।
आम जन से इन खबरों का सरोकार नहीं रहता।
पत्रकार समाज का प्रबुद्ध प्राणी होता है उसे यह अधिकार प्राप्त है कि वह अधिकारी, प्रोफेसर, राजनेता, वकील, न्यायाधीश, आदि सभी के कार्य व्यापार पर नजर रखें और जनहित में उसका मूल्यांकन कर करके सब की खबर ले। अर्थात आलोचना भी करें किंतु वर्तमान पीढ़ी के पत्रकारों ने तो स्वयं ही अपनी स्थिति दयनीय बना रखी है। आम जनता के लिए यह पीढ़ी क्या करेगी …?












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