रवि कान्त पत्रकार
प्राचीन समय में एक सेठ सेठानी थे, सुखी-सम्पन्न थे, पर अकेले ही थे। उन्होंने एक गाय पाल रखी थी, उसकी देखभाल करना, चारा खिलाना और पानी पिलाना इन सबका दायित्वनिर्वाह उनका रामू नाम का एक सेवक सच्चे मन और निष्ठा से किया करता था। समय पर गाय की सभी सेवाएँ होतीं और उसका दूध निकाला जाता। सुबह-शाम दोनों समय उस गाय का दूध निकालकर वह कर्मिष्ठ सेवक रामू अपने सेठजी के घर दे जाता। एक बार सेठजी को तीर्थयात्रा करने की इच्छा हुई। सेठ-सेठानी ने यात्रा पर चलने की तैयारी की और चलते समय सेठ जी ने अपने सेवक रामू को समझाया- भाया! हमारे पीछे से गाय का अच्छी तरह से ध्यान रखना, चारे का पूरा प्रबन्ध है ही, दूध निकालकर अपने घर ले जाना, हमें यात्रा से वापसी में एक महीना लग ही सकता है, चिन्ता नहीं करना, खर्चे और अपनी मजदूरी मेहनताना के बतौर ये कुछ रुपये रख लो और पीछे से घर का भी ध्यान रखना।
सेठ-सेठानी तीर्थयात्रा पर चले गये। सेठ जी के कहे अनुसार उनका वह सेवक रामू उनके घर और गायकी अच्छी तरह देखभाल करता और गाय का दूध निकालकर अपने घर ले जाता, लेकिन दूध को अपने घर के आँगन में फैला देता और गली-मुहल्ले के कुत्ते-पिल्ले वहाँ आकर दूध को चाट चाटकर पीते। रामूकी भोली-भाली पत्नी ने अपने पति के दूध फैलाने पर उसी दिन उसे टोका- दूध को फैलाने से क्या लाभ ? हमारे इन दोनों छोटे-छोटे बच्चों को दूध पीनेको मिल जाय, इससे अच्छी बात क्या हो सकती है? आपको सेठ जी कहकर गये हैं कि ‘दूध घर ले जाना।’ रामू ने पूरा उत्तर नहीं दिया- नहीं-नहीं, इन बच्चों को दूध पिलाकर। पत्नी ने पति की अधूरी बात पूरी की – ‘आदत खराब नहीं करनी।’ उसे अपने पति की बात समझ में तो नहीं आयी, पर उसने कोई तर्क-वितर्क नहीं किया। अपना-अपना प्रारब्ध है, समझकर चुप रही। गृहशान्ति बनी रही। रामूका दूध निकालकर सेठजी के कहने से दूध को घर लाना और अपनी समझ से दूध को घर के आँगन में डाल देना उसकी दैनिक क्रिया बन गयी। गली-मुहल्ले के कुत्ते, पिल्ले उस दूध को चट कर जाते। लगभग एक महीना बीता। सेठ-सेठानी तीर्थयात्रा से वापस आये। रामूने गाय का दूध निकाला और सेठजी के घर पर दूध रख दिया। रामू अपने घर आया, आज तो दूध ही नहीं था, आँगन में क्या फैलाता ? लेकिन गली-मुहल्ले के कुत्ते-पिल्ले रोजाना की तरह समय पर उसके घर के आँगन में इकट्ठे हुए, दूध न पाकर ‘भौं भौं’ कर भौंकने लगे, रोने लगे। रामू की पत्नी ने भौंकनें-रोने का दारुण दृश्य देखा और पूछने की मुद्रामें पति के मुख की ओर देखने लगी। पति ने कहा- देवी ! तुमने इन्हें देख लिया, मैंने अपने बच्चों को वह दूध इसीलिये नहीं पीने दिया, नहीं तो आज ये अपने बच्चे भी इसी तरह से रोते, बिलखते। बात आज रामूकी पत्नी की समझ में आयी -अपने हक मेहनत का खायें-पीयें, स्वाभिमान से जीयें और अपने सामर्थ्य तथा मर्यादा में रहें।
