जौनपुर। गरीब छात्रों को नि:शुल्क शिक्षा देने के लिए बनाई गई आरटीई अर्थात शिक्षा का अधिकार योजना अच्छे विद्यालयों के लिए सर दर्द बन गई है। विद्यालय प्रशासन का कहना है कि इस योजना के अंतर्गत एक भी बच्चा ऐसा नहीं आता जो गरीब दिखलाई पड़े। वह प्राय निजी स्कॉर्पियो और फॉर्च्यूनर आदि अच्छी गाड़ियों से स्कूल आते हैं और नौकर उन्हें छोड़ करके जाता है फिर छुट्टी के समय आकर के ले भी जाता है। गरीबों के लिए नि:शुल्क सेवार्थ संचालित यह योजना मखौल बन कर रह गई है।
जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी द्वारा कम से कम इसका सत्यापन तो कर ही लेना चाहिए की गरीब बच्चे कौन है वस्तुत: क्या यह गरीब हैं? सच्चाई तो यह है कि गरीब बच्चों को भेजा ही नहीं जाता है? बेसिक शिक्षा की आरटीई सूची में जो बच्चे भेजे जाते हैं, यह जानते हुए कि यह लोग गरीब नहीं है कॉलेज प्रशासन मजबूरन इनका प्रवेश लेता है और इनको सुविधाजनक ढंग से शिक्षा भी देता है। इन स्कूलों के प्रबंधक बताते हैं कि बेसिक शिक्षा अधिकारी और उनके कार्यालय के लोग इस योजना को धूल दुश्रित करने के लिए कटिबद्घ होकर के गरीबों के साथ अन्याय कर रहे है और गरीबों की जगह अमीरों की सेवा कर रहे है।
विद्यालय के प्रबंधकों का कहना है कि उत्तर प्रदेश शासन द्वारा आरटीई योजना का जो ₹5000 प्रति छात्र आता है, बिल पास करते समय औपचारिकता के नाम पर वहां के बाबू लोग उसमें से आधा बंदरबांट कर लेते हैं।
यदि हर विभाग जैसा की बेसिक शिक्षा अधिकारी कार्यालय कर रहा है ऐसे ही जन कल्याणकारी सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन कर रहे होंगे तो भविष्य में जो 2027 में चुनाव होने जा रहा है, उसमें भगवान ही मालिक है।













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