श्याम नारायण पाण्डेय वरिष्ठ पत्रकार
देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम सोमनाथ है जो गुजरात प्रदेश की काठियावाड़ क्षेत्र के प्रभाष क्षेत्र में विद्यमान है। इस ज्योतिर्लिंग की कथा इस प्रकार है।
राजा दक्ष ने अपनी 27 बेटियों में अश्विनी भरणी आदि का पाणिग्रहण चंद्रमा से संपन्न करा कर विदाई कर दिया। चंद्रमा की आसक्ति केवल रोहिणी में रही। शेष 26 ने चंद्रमा से उपेक्षा पाई।
अपनी व्यथा की कथा राजा दक्ष की पुत्रियों ने अपने पिता को सुनाई। तो राजा दक्ष बहुत दुखी हुए और चंद्रमा को समझाया कि- हे कलानिधे! तुम निर्मल और यशस्वी कुल में उत्पन्न हुए हो, तुम्हारा अपने आश्रित धर्मपत्नियों पर दुर्भाव रखना तथा किसी एक को ही सम्मान देना उचित नहीं है। इस कार्य से पति को नरक यातना भोगनी पड़ती है। अब तक जो किया, कर लिया, किंतु भविष्य में ऐसा करना उचित नहीं है।

राजा दक्ष तो अपने दामाद को यह समझाकर निश्चिंत हो गए और अपने निवास स्थान पर चले गए किंतु चंद्रमा ने उनकी बात बिल्कुल नहीं मानी। उनका प्रेम भाव मात्र रोहिणी में ही रहा। इससे क्रुद्ध होकर राजा दक्ष ने चंद्रमा को छय रोग होने का श्राप दिया। श्राप लगते ही चंद्रमा दिनों – दिन क्षीण होने लगे। सर्वत्र हाहाकार मच गया। सभी देवता वशिष्ठ आदि ऋषियों के साथ ब्रह्मा के पास गए। ब्रह्मदेव ने उन्हें आदेश दिया कि आप लोग चंद्रमा से कहें कि वह प्रभाष क्षेत्र में जाकर मृत्युंजय विधान से शिवजी की आराधना और अर्चना करें। इस तप से भगवान भोलेनाथ प्रसन्न होंगे और चंद्रमा को क्षय रोग से मुक्ति मिल जाएगी। इसके बाद चंद्रमा ने प्रभाष तीर्थ में जाकर मृत्युंजय विधान से 6 माह तक शिव आराधना किया। साथ ही 10 करोड़ महामृत्युंजय मंत्र का जप भी किया। इससे प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान भोलेनाथ प्रकट हो गए और चंद्रमा को छय रोग से मुक्त करते हुए कहा कि एक पक्ष में तुम्हारी कला क्रमशः क्षीण होगी और दूसरे पक्ष क्रमशः बढ़ेगी। पूर्णिमा के दिन तुम स्वस्थ और निरोग हो जाओगे।
चंद्रमा को यश देने के लिए भगवान शंकर यहां सोमनाथ नाम से प्रतिष्ठित हो गए। शास्त्रों का मत है कि इस ज्योतिर्लिंग का दर्शन और पूजन करने तथा चंद्र कुंड में स्नान करने से लोगों का क्षय और कुष्ठ रोग जड़ – मूल से समाप्त हो जाता है और उन्हें मुक्ति भी प्राप्त होती है।













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