सत्यनारायण व्रत कथा का मर्म

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वैदिक धर्म में कठिनाइयों को देखते हुए भगवान वेदव्यास ने सरल ढंग से समझते हुए 18 पुराणों की रचना की है। पुराणों में वैदिक दर्शन को कथा और कहानियों के माध्यम से लोगों को यह बताया है कि परोपकार ही पुण्य है और दूसरों को दुख देना ही पाप है। यह सत्यनारायण व्रत कथा महर्षि वेद व्यस से प्रणीत स्कंद पुराण से ली गई है। स्कंद पुराण में प्रमुख रूप से भगवान भोलेनाथ के जेष्ठ पुत्र कार्तिकेय जिसका दूसरा नाम स्कंद भी है उनके गुणों का वर्णन है। पुराणों में सबसे बड़ा स्कंद पुराण ही है इसके दो रूप हैं खंडात्मक और संहितात्मक।

दोनों में क्रमशः है 81- 81 हज़ार श्लोक हैं। इस कथा को अपने भक्तों को सुनने वाले विद्वान केवल कथा ही सुनते हैं किंतु उस समय जो स्कंद पुराण की कथा में आता है अपनी मनोकामना को पूर्ण करने के लिए जिन लोगों ने यह कथा पूजन किया था, वह किस प्रकार का पूजन था, विद्वान लोग यह नहीं बताते। इसके लिए नाना प्रकार की विसंगतियां क्यों पैदा होती हैं प्रश्न प्रति प्रश्न जो अनुत्तरित रहते हैं उनका निराकरण होना चाहिए।

यथार्थ यह है कि जिस खंड से यह कथा उद्धारित है उसका नाम रेवाखंड है। उसमें सत्य स्वरूप भगवान नारायण का पूजन किया जाता है पहले सत्यनारायण भगवान का पूजन फिर उसे पूजन के करने के पश्चात लोगों की मनोकामनाएं किस प्रकार पूरी हुई उनको इस कथा से लाभ क्या हुआ यह बताया जाता है इसी को माहात्म्य की कथा कहा जाता है तो सर्वप्रथम पूजन उसके बाद में फिर आरती। इस पौराणिक ग्रंथ में बताया गया है कि यह कलयुग में अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए सर्वोत्तम साधन है यही सत्यनारायण व्रत कथा का महत्व है।

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