दुर्गा सप्तशती के चौथा, पांचवा और छठवां अध्याय का वर्णन

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दुर्गा देवी के चरित्रों मे अध्याय चार और पांच मे माँ जगदम्बा की स्तुति गायी गयी है। मार्कण्डेय पुराण में जब भगवती पराम्बा ने देवताओं के कल्याण हेतु राक्षसों का वध कर दिया है। तब इन्द्रादि देवताओं ने देवी की स्तुति की हैं। देवताओं ने अपने गीत में स्तुति किया है कि हे जगदम्बा आप समस्त देवताओं की समुच्चय हैं हम समस्त देवगण आपको सादर नमस्कार करते हैं। आप ही पुण्य आत्माओं के घर में लक्ष्मी और पापियों के दरिद्रता के रूप में, शुद्ध अंतःकरण वाले पुरुषों के हृदय में बुद्धि के रूप में, सत्पुरुषों में श्रद्धा के रूप में, तथा कुलीन पुरुषों में लज्जा के रूप में निवास करती हैं। हे देवी आप हमारा कल्याण करते हुए विश्व का पालन करिए। हे माँ आप में समस्त राक्षसों का संहार करके समस्त लोको की रक्षा की है। उन शत्रुओं को युद्ध भूमि में मरा कर स्वर्ग लोक में भी पहुंचाया है। उनम्मत दैत्यों के आतंक के भय को भी निर्मुर्ण कर दिया है जिससे हम लोग आज स्वतंत्र हैं। हे दायिनी मां आप को कोटिशः नमस्कार है। ऋषि मार्कण्डेय कहते हैं कि इस प्रकार जब जगन्माता दुर्गा की स्तुति की और उनका दिव्य पुष्पों,अगर -तगर, चंदन आदि द्वारा पूजन भी किया। सब ने मिलकर भक्ति भाव से धूप, दीप और नैवेद्य अर्पण कर प्रसन्नतापूर्वक श्रद्धा और भक्त के साथ उनका स्त्वन किया तब देवी ने प्रसन्न होकर देवताओं से कहा कि आप लोग अपना इच्छित वरदान मांगो।इस पर देवताओं ने कहा कि हे – दुर्गा माता आपने तो हम देवताओं का असीम संकट महिषासुर का वध करके दूर कर दिया है फिर भी आप हमें प्रसन्नता पूर्वक और कुछ देना ही चाहती हैं तो हम देवताओं की यही कामना है कि हम जब भी आपका स्त्वन करें, आपको संकट की स्थिति में पुकारे तब – तब आप अभिलंब प्रकट होकर हमारी रक्षा कर हमे निर्द्वन्द करें। हे अम्बिके! जो मनुष्य इन दिव्य अस्त्रोतो द्वारा आपकी स्तुति को उसे समृद्धि और वैभव देने के साथ ही उसको भी धन, संपत्ति, स्त्री, पुत्र, वैभव आदि से संपन्न करने की कृपा करें। ऋषि कहते हैं कि हे राजन – सूरथ देवताओं ने जब अपने तथा जगत के कल्याण के लिए अभिवंदन और स्त्वन द्वारा जगदंबा के प्रसन्न किया तब वे तथास्तु कहकर अंतर्धान हो गई। पांचवें अध्याय में देवी शुम्भ- निशुम्भ का वध करने के लिए महागौरी के रूप में प्रकट हुई वह कथा ऋषि श्रेष्ठ मार्कण्डेय ने यह कथा राजा को सुनाया प्रारम्भ किया। पूर्व काल में सुम्भ और निशुंभ महाबली राक्षस हुए उन्होंने अपनी ताकत के घमंड में आकर सचिपति इंद्र से इंद्रासन छीन लिया। साथ ही तीनों लोकों पर अपना आधिपत्य कायम कर लिया। ये दोनों राक्षस सूर्य,चंद्रमा, यम, वरुण आज के यज्ञ भाग का भी अपनी शक्ति के बल पर उपभोग करने लगे। ये वायु और देवी अंबिका का कार्य भी करने लगे। उन दोनों ने सभी देवताओं को अपमानित, राज्य भ्रष्ट, पराजित तथा अधिकारहीन करके स्वर्ग से निकाल दिया। इन दोनों असुरों से पराजित देवताओं ने परमवा अपराजिता देवी का स्मरण किया क्योंकि जगदम्बा ने देवताओं को वरदान दिया था कि- आपत्तिकाल में यदि आप लोग मेरा स्मरण करेंगे तो मैं तुरंत प्रकट होकर तुम्हारी सभी प्रकार के आपत्ति- विपत्ति का नाश कर दूंगी। इस प्रकार देवताओं, ने देवी के विष्णुमाया स्वरूप की स्तुति करना प्रारंभ कर दिया। इस प्रकार देवताओं ने लगभग चार दर्जन श्लोक में देवी की दिव्य स्तुति की। जब देवता स्तुति कर रहे थे उसी समय पार्वती जी गंगाजल में स्नान करने के उद्देश्य से वहां गयी। देवताओं को स्तुति परत मुद्रा में देख कर उन्होंने प्रश्न किया कि आप यहां इकट्ठे होकर किसकी स्तुति कर रहे हैं। इस पर उन्हीं के शरीर से प्रकट हुई शिव देवी ने कहा ये देवता शंभू दैत्य से तिरस्कार और निशुंभ से पराजित होकर मेरी ही स्तुति कर रहे हैं। उसी समय पार्वती देवी के शरीर से अंबिका देवी का प्राकट्य हुआ। तदनंतर शुम्भ- निशुम्भ के सैनिक चंड- मुंड वहां आए। अब उन्होंने मां अंबिका के दिव्य स्वरुप को देखा तो देखते ही रह गए। वापस लौटकर शुम्भ- निशम्भु से वे दोनों कहने लगे कि- हे महाराज एक अत्यंत मनोहर स्त्री जो अपनी दिव्य क्रांति से समस्त हिमालय क्षेत्र को आलोकित कर रही है। वैसा रूप तो किसी ने नहीं देखा। हे असुरेश्वर आप पता लगाइए कि यह देवी कौन है और आप उसे अपने साथ ले आइये क्योंकि यह स्त्री रत्न है। यह अपने दिव्यांगों के सौंदर्य से दिगदिगंत को आलोकित कर रही है। चंड और मुंड की यह बात सुनकर शुम्भ ने सुग्रीव के दूत बनाकर देवी के पास भेजा और कहां कि- उस विनम्र वाणी में कहना कि-दैत्यराज शुम्भ तीनों लोकों के अधिश्वर हैं। उन्होंने कहा है कि देवी आप भी तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ सुंदरी हैं तुम हमारे पास आ जाओ क्योंकि रत्नों का उपयोग करने वाले त्रिलोक में हम ही हैं। मेरे शरण में आने पर तुम्हें असीम ऐश्वर्या की स्वामिनी बनने का सौभाग्य मिलेगा। अतएव तुम मेरी पत्नी बन जाओ। देवी ने दूत सुग्रीव से कहा कि- तुम सत्य ही कह रहे हो किन्तु मैं क्या करूं। मैं प्रतिज्ञाबद्ध हूं कि- जो मुझे संग्राम में जीत लेगा! जो मेरे अभियान को चूर्ण कर देगा तथा संसार में जो मेरे सामान बलवान होता वही मेरा स्वामी होगा। उन्होंने कहा कि शुम्भ अथवा महानिशुंभ यहां पधारे और मुझे जीतकर मेरा पानी ग्रहण करें। दूत ने कहा कि देवी इतना दर्द अच्छा नहीं है। संसार में कौन ऐसा है जो शुम्भ एवं निशुम्भ के सामने खड़ा होने योग्य है। तुम अकेली स्त्री क्या कर सकती हो। यदि वे आएंगे तो तुम्हारा केश पकड़ कर घसीटते हुए ले जाएंगे तो आप क्या करेंगे ? देवी ने कहा कि तुम्हारा कहना ठीक है किंतु मैंने जो प्रतिज्ञा कर रखा है वह जाकर अपने स्वामी को आदर से साथ बता देना। देवी के इतना कहने पर चंद्र मुंड ने जाकर देवी अंबिका का संदेश शुभ और निशुंभ को यथावत सुनाया इस पर क्रोध से भरकर आसुलेश्वर शुभ और निशुंभ ने अपने महा सेनापति धूमल लोचन को आदेश दिया कि तुम अपनी सेवा के साथ जो और उसे स्त्री का कैसे पकड़ कर मेरे पास ले आओ कोई अन्य उसकी रक्षा में खड़ा होता है तो उसे भी वही मार देना इतना सुनकर धूम्रपान 60000 की विशाल सेवा के साथ वहां पहुंच गया देवी को ललकारा और कहा कि तुम और निशुंभ जो मेरे महाराज हैं उनके पास तुम तुरंत चलो यदि तुम नहीं चलोगे तो मैं तुम्हारी छोटी पड़ कर भेजते हुए उन्हें अपने तुम्हें अपने स्वामी के पास ले चलूंगा इतना कहने पर देवी ने जोर से हम का शब्द किया उसे धन में इतनी तीव्रता थी कि वह तुरंत जलकर भस्म हो गया इसके बाद अंबिका ने धूम्रलोचन की सेवा का शक्ति और फरसे से बंद करने लगी इतने में देवी का वाहन सिंह अपने दांत नाथ और पंजों से दैत्य सेवा का नाश करने लगा बहुत ही कम समय में सिंह ने विशाल सेवा का वध कर डाला इस प्रकार धूम लोचन और 60000 सी देवी के द्वारा नष्ट हो गई जब शुभ ने ऐसा सुना तो वह क्रोध में भरकर चंड और मुंड को आदेश दिया है कि तुम विशाल सेना लेकर तत्काल जाओ और उसे स्त्री को घसीटते हुए ले आओ इस प्रकार देवी द्वारा धूम्रलोचन और उनकी सेना के बाद का छठवां अध्याय संपन्न हुआ!

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