जौनपुर। पंडित यादवेंद्र चतुर्वेदी को पत्रकार कहा जाए या वरिष्ठ अधिवक्ता कहा जाए या साहित्य से जुड़े हुए एक अच्छे इंसान की संज्ञा दी जाए, वह भी थोड़ी है।
ये बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी है आपका कहना है कि वस्तुत है पत्रकारिता जन सेवा का सर्वोत्तम माध्यम रही है और जनहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देने के कारण ही पत्रकारों का सम्मान होता रहा।
यह विचार वरिष्ठ पत्रकार और शासकीय अध्यक्षता चतुर्वेदी ने व्यक्त किया। आप अपने पैतृक आवास पर ही तीसरी आंख चैनल के संपादक श्याम नारायण पांडे के साथ पुरानी यादों को साझा कर रहे थे। आप अस्वास्थ्यता के कारण काफी समय से घर पर ही रह रहे हैं साहित्य, पत्रकारिता और वकालत से जुड़े लोग उनसे मिलने के लिए पुरानी बाजार उनके आवास पर ही जाया करते हैं।
चतुर्वेदी जी ने पहले के पत्रकारों की चर्चा करते हुए कहा कि वे लोग पढ़े और कड़े दोनों ही प्रकार की पत्रकारिता में शामिल रहे, जैसे – सर्वश्री रमाशंकर लाल – संवाददाता नेशनल हेराल्ड, पंडित चंद्रेश मिश्रा – संवाददाता हिंदी दैनिक आज, डॉक्टर देवेंद्र उपाध्याय – संवाददाता हिंदी दैनिक जनवार्ता, हरिश्चंद्र श्रीवास्तव- संवाददाता अंग्रेजी दैनिक नॉर्दर्न इंडिया पत्रिका और हिंदी दैनिक अमृत प्रभात, तीर्थराज तिवारी संवाददाता- पीटीआई, त्रिलोकी नाथ मिश्रा- संवाददाता स्वतंत्र भारत, यादवेंद्र दत्त चतुर्वेदी स्वयं करपात्री जी के अखबार दैनिक सन्मार्ग से जुड़े हुए थे। इसके अलावा दिनेश कुमार सिंह-संपादक – क्रांतिकारी हिंदी साप्ताहिक समय, कैलाश नाथ – संपादक हिंदी दैनिक तरुण मित्र, कामेश्वर नाथ श्रीवास्तव – साप्ताहिक जौनपुर समाचार, प्रो० एस पी चंद्र – संवाददाता यूएएनआई। ये सभी लोग समाज के योग्य, प्रतिष्ठित और निर्भीक व्यक्ति थे।
उस समय पत्रकारिता का व्यवसायिक स्वरूप नहीं था। आज की पत्रकारिता की तुलना उस वक्त की पत्रकारिता से नहीं की जा सकती।
जब से द्वितीय प्रेस आयोग की सिफारिश पर पत्रकारिता को उद्योग से जोड़ दिया गया तब से तमाम उद्योगपतियों का पत्रकारिता में प्रवेश हो गया और अब यह जनहित का हथियार न होकर मुनाफे का धंधा बन गया और ऐसे धंधेबाजों के सहायक के रुप में पत्रकार भी टूलकिट से हो गए।
आज की पत्रकारिता के बारे में एक शायर का यह शेर ठीक लगता है कि-
छिन – छिन पल -पल-
रोज़ संवरना पड़ता है–
पेट के खातिर सब कुछ-
करना पड़ता हैं–
यह तो अपने पेशे की-
मजबूरी है–
रंग हर एक तस्वीर में-
भरना पड़ता है।।












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