जय बोलो बेईमान की – वशिष्ठ नारायण

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जौनपुर। आज जब हम गांव सभा से लोकसभा तक की बात करते हैं तो देखते हैं की यत्र- तत्र सर्वत्र बेईमानों का ही बोलबाला दिखलाई देता है। कोई उनके खिलाफ बोल भी नहीं सकता। चाहे वह जो भी करें, चाहे जैसे रहे, सब लोग उनकी जय जयकार करते हैं। यह विचार पूर्वांचल के वरिष्ठ सामाजसेवी वशिष्ठ नारायण सिंह ने व्यक्त किया।

आपने बताया कि – इस वर्तमान भारतीय लोकतंत्र में गांव सभा की बैठक कभी नहीं होती। करोड़ों रुपए का प्रस्ताव प्रधान स्वयं ही पारित कर देता है। यह जब से ग्राम सभा बनी है या जब से कार्य कर रही है तब से यह परंपरा यथावत चालू है। ग्राम प्रधान यह भी जरूरत नहीं समझने की गांव के जो निर्वाचित सदस्य हैं सरकारी धनराशि के बारे में कम से कम उन्हें भी बता दिया जाए। उनसे परामर्श लेकर के इस पैसे को खर्च किया जाए लेकिन प्रधान उसे भी उचित नहीं समझता। केवल ग्राम सभा की ही यह स्थिति नहीं है बल्कि गांव सभाओं को देखने वाली जो क्षेत्र समितियां हैं उनकी यही भी स्थिति है। वहां के प्रमुख जो चुने जाते हैं उनका चुनाव केवल दिखलाने के लिए होता है। यही चीज गांव सभा से लोकसभा तक चल रही हैं लेकिन कहीं भी कोई बोलता नहीं।

यह सबको दिखलाई पड़ता है कि गांव सभा के प्रधान का कार्यकाल देख लीजिए तो वह 5 वर्ष में अपनी पहली आर्थिक अवस्था से ऊपर उठकर कम से कम करोड़पति हो जाता है।

चर्चित मंत्री जी को ही देख लीजिए, बेचारे जब मंत्री नहीं थे या विधानसभा सदस्य नहीं थे तो खड़खड़िया साइकिल से चलते थे और विधानसभा सदस्य एवम् मंत्री बनते ही उन पर धन की बरसात होने लगी। ऐसा लगता है कि अलकापुरी के राजा धन कुबेर ने स्वयं ही इनके यहां अपना आवास बना लिया है। अब इन्हें कहीं पुश्त तक के लिए नहीं सोचना है।
एक शायर का कहना है कि- हम तो ऐसे बारे में सोचते- सोचते पागल हो जा रहे हैं।
तो हमने बस इस चिंता को दो लाइन में खत्म कर दिया।

किस-किस की फिक्र कीजिए
किस-किस पर रोइए
आराम बड़ी चीज है, मुंह ढक कर सोइए

         जय बोलो बेईमान की। 🙏🏻

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