जौनपुर। राजा यादवेंद्र दत्त की सत्ताइसवीं पुण्यतिथि पर आज हम उन्हें श्रद्धा एवं सम्मान के साथ स्मरण कर रहे हैं। उनका व्यक्तित्व एवं कृतित्व अत्यंत बहुआयामी था। वे गद्दीनशीन राजा तो थे ही, वर्ष 1944 में उनका परंपरागत विधि-विधान से राज्याभिषेक भी हुआ था।
कहा जाता था कि जो व्यक्ति उनसे एक बार मिल लेता था, वह उनका होकर रह जाता था। उनके पास एक हस्तलिखित पुस्तिका थी, जिसमें लगभग 500 लोगों के नाम अंकित थे। राजा साहब ने उसके ऊपर लिखा था—“ये हमारे लोग हैं, मेरे लिए प्राण भी दे सकते हैं।”
उत्तर प्रदेश सरकार के तत्कालीन गृह मंत्री बाबू हरगोविंद सिंह राजा साहब के बारे में कहा करते थे कि राजा साहब की हवेली में एक ऐसा कुआँ है, जिसका पानी पी लेने वाला व्यक्ति जीवन भर किसी दूसरे को वोट नहीं दे सकता।
राजा साहब ने अपनी शिक्षा पूर्ण करने के पश्चात राजनीति में प्रवेश किया और जनसंघ की सदस्यता ग्रहण की। अपनी व्यवहार-कुशलता, प्रखर बुद्धिमत्ता और जनप्रियता के कारण वे शीघ्र ही प्रदेश के प्रमुख नेताओं में गिने जाने लगे। जौनपुर की जनता ने उन्हें सदैव सिर-आँखों पर बिठाया।
अपने ओजस्वी वक्तृत्व और मिलनसार स्वभाव के कारण वे जौनपुर से चार बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। जनसंघ ने उन्हें दो बार विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा, जिसका उन्होंने अत्यंत कुशलतापूर्वक निर्वहन किया।
आपातकाल के बाद जब कांग्रेस की सत्ता समाप्त हुई और विभिन्न विपक्षी दलों ने मिलकर जनता पार्टी का गठन किया, तब राजा साहब जौनपुर से सांसद चुने गए। यद्यपि विभिन्न विचारधाराओं के कारण जनता पार्टी का यह प्रयोग अधिक समय तक सफल नहीं हो सका और पार्टी बिखर गई। इसके बाद जनसंघ से जुड़े नेताओं ने एकत्र होकर नए राजनीतिक दल भारतीय जनता पार्टी का गठन किया। राजा साहब एक बार फिर सांसद चुने गए।
राजा साहब के संबंध भारतीय राजनीति के अनेक शीर्ष नेताओं से अत्यंत आत्मीय रहे। अटल बिहारी वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी, लालकृष्ण आडवाणी, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, मधु दंडवते आदि नेताओं से उनके जीवन भर अच्छे संबंध रहे। विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल भी समय-समय पर हवेली आते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी तो हवेली के लगभग पारिवारिक अतिथि के समान रहे।
जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशी बनाए गए, तब उनका निर्वाचन कार्यालय हवेली में ही स्थापित था और चुनाव की अनेक व्यवस्थाएँ भी वहीं से संचालित होती थीं।
राजा साहब के संबंध केवल एक राजनीतिक दल तक सीमित नहीं थे। विभिन्न दलों के अनेक वरिष्ठ नेता भी हवेली आते रहे, जिनमें चौधरी चरण सिंह, पंडित कमलापति त्रिपाठी और डॉ. डी.एन. चतुर्वेदी जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं।
साहित्य और संस्कृति से गहरा लगाव
राजा साहब का साहित्यकारों से भी अत्यंत घनिष्ठ संबंध था। हवेली में पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी, हजारी प्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त और वीर रस के प्रसिद्ध कवि श्याम नारायण पांडे जैसे साहित्यकारों का प्रायः आना-जाना लगा रहता था।
जब पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी तुलसीदास रचित बरवै रामायण का गद्यानुवाद अपनी साहित्यिक पत्रिका सरस्वती में प्रकाशित करना चाहते थे, तब उन्हें यह दुर्लभ पुस्तक कहीं उपलब्ध नहीं हुई। इस पुस्तक की खोज में उन्होंने राजा साहब से संपर्क किया। राजा साहब ने अपने निजी पुस्तकालय से उन्हें बरवै रामायण उपलब्ध कराई।
राजा साहब कहा करते थे कि “दद्दा” अर्थात मैथिलीशरण गुप्त की कालजयी रचना ‘साकेत’ का लेखन हवेली में ही हुआ था।
प्रख्यात साहित्यकार अमृतलाल नागर की प्रसिद्ध कृति ‘मानस का हंस’ में भी राजा साहब और हवेली का उल्लेख मिलता है।
श्याम नारायण पांडे का सम्मान
भाजपा के वरिष्ठ नेता भैरों सिंह शेखावत जब राजस्थान के मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने हल्दीघाटी के संग्राम और उससे संबंधित साहित्यिक कृति को लेकर एक भव्य महोत्सव आयोजित किया था। राजा साहब को भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।
कार्यक्रम के पश्चात राजा साहब ने मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत से कहा कि ‘हल्दीघाटी’ जैसी अद्भुत रचना के रचयिता श्याम नारायण पांडे जी अभी जीवित हैं, किंतु इस कार्यक्रम में उन्हें आमंत्रित नहीं किया गया।’
इस पर भैरों सिंह शेखावत ने कहा कि वे पुनः एक कार्यक्रम आयोजित कर श्याम नारायण पांडे का सम्मान करेंगे। बाद में उन्होंने एक भव्य समारोह आयोजित कर कवि श्याम नारायण पांडे का अभिनंदन किया और उन्हें चाँदी की एक गदा भेंट की।
श्याम नारायण पांडे वह गदा लेकर सीधे हवेली पहुँचे। राजा साहब इससे अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने जौनपुर के अनेक साहित्यकारों को आमंत्रित कर हिंदी भवन में एक विशाल साहित्यिक समारोह आयोजित किया, जहाँ श्याम नारायण पांडे का उन्होंने स्वयं भी सम्मान किया।
साहित्य, आखेट और सामाजिक सरोकार
राजा साहब को शिकार साहित्य पर पुस्तक लिखने वाले देश के प्रथम लेखकों में माना जाता है। हिंदी और अंग्रेजी भाषाओं में उनकी लगभग आधा दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हुईं। उनकी पुस्तक ‘आखेट’ पर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें पुरस्कार भी प्रदान किया गया।
अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर भी वे अत्यंत चिंतित और सक्रिय रहे। मंदिर आंदोलन के दौरान तत्कालीन सरकार ने बाबरी मस्जिद ध्वंस प्रकरण के संबंध में उन्हें गिरफ्तार भी किया था।
जब मंदिर निर्माण के लिए कारसेवा प्रारंभ हुई, तब महाराज स्वयं भी उसमें सम्मिलित हुए। एक अवसर पर वे मिट्टी की टोकरी लेकर चलते हुए लड़खड़ाने लगे तो अशोक सिंघल दौड़कर उनके पास पहुँचे और उन्हें संभालते हुए कहा—“महाराज, बस हो गया, अब मंदिर बनेगा।”
इस दृश्य को बीबीसी लंदन के तत्कालीन उत्तर प्रदेश संवाददाता रामदत्त त्रिपाठी ने देखा था और उस समय यह समाचार बीबीसी लंदन से प्रसारित भी किया गया।
विनम्र श्रद्धांजलि
आज उनकी सत्ताइसवीं पुण्यतिथि पर राजा साहब के वंशज, महाविद्यालयों के प्राचार्य द्वय, शिक्षकगण एवं समस्त कर्मचारी उन्हें श्रद्धापूर्वक स्मरण करते हुए अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं।
राजा यादवेंद्र दत्त के व्यक्तित्व और कृतित्व के ये मात्र कुछ संकेत हैं। उनके जीवन, कार्यों, राजनीतिक योगदान, साहित्यिक रुचि और सामाजिक सरोकारों पर एक विस्तृत पुस्तक लिखी जा सकती है।
लिखना थोर, समझना ढेर।
— श्याम नारायण पांडे












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