श्याम नारायण पाण्डेय वरिष्ठ पत्रकार
यह वाकया 1957 – 58 का मध्य प्रदेश जनपद के देवास जिले के पिपरावा गांव का है। इस गांव में एक वासुदेव बाबा रहा करते थे। वासुदेव बाबा एक सिद्ध महात्मा थे। बाबा क्षेत्र में रामायरणी के नाम से जाने जाते थे। घूम-घूम कर भगवान राम की कथा कहते थे और यह कार्यक्रम बाबा आश्विन नवरात्र में रामलीला के रूप में और कहीं-कहीं कृष्ण लीला के रूप में भी मंचन करवाते थे।
जब कभी लोग बीमारी से तंग आकर बाबा के पास आते थे तो वे उन्हें भभूत देकर के ही ठीक कर देते थे।
एक बार बाबा के यहां आठ साधु आए और कहने लगे की महात्मा जी यहां से 3 किलोमीटर दूर एक गुफा में किसी बड़े संत की समाधि है चलिए दर्शन कर लिया जाए। सभी लोग इस गुफा के द्वार पर जाकर के जब कुछ नहीं मिला तो आगे बढ़ गए। लगभग 1 किलोमीटर दूर चले होंगे की पांच लोग तो थक करके वापस लौट गए किंतु तीन लोग आगे बढ़ते गए। शाम हुई गुफा में ही सो गए। फिर दूसरे दिन भी थके होने के बावजूद आगे बढ़ना शुरू किया। फिर शाम हो गई फिर रुक गए उसके बाद सो करके उठने के बाद फिर चलने लगे। एकदम थक गए थे।
तीसरे दिन उन्हें एक विशालकाय साधु महात्मा का दर्शन हुआ जो उसे गुफा में बैठे हुए थे। उनके सिर के बाल बगल में घास की देरी जैसे रखे हुए थे और उनके आंख की पलक इतनी बड़ी थी की वह जमीन का स्पर्श कर रही थी। शरीर का आकार तो इतना विशाल था कि उनको कहीं जाना होता तो एक बड़ी ट्रक की व्यवस्था करनी पड़ती। जब नजदीक जाने पर हम लोगों की आहट से उन्होंने अपने दोनों हाथों से अपनी पलके उठाई। साधुओं का वेश देखकर वह बहुत प्रसन्न हुए।तीनों साधुओं ने उनको साष्टांग प्रणाम किया। महात्मा ने कहा कि तुम भूखे थके होंगे इसलिए बैठो, कुछ देते हैं। महात्मा ने अपनी चैतन्य धूनी से निकाल करके कंद जैसा तीन लड्डू दिया। महात्मा लोग इस छोटे से लड्डू में ही तृप्त हो गए और उनका मन और शरीर ऊर्जा से भर गया।
महात्मा ने साधुओं से पूछा कि क्या – राम का अवतार हो गया है?
साधुओं ने कहा कि प्रभू – राम अवतार हो गया है, कृष्ण अवतार हो गया है और हम इस समय कलयुग में चल रहे हैं। फिर महात्मा ने कहा – बच्चा – हम तो सतयुग से यहां तपस्या पर बैठे हुए हैं। अच्छा- आपके पास तुलसी दल है। एक साधु ने अपने कमंडल से उन्हें तुलसी दाल निकाल कर दिया, तो महात्मा ने बड़ा आश्चर्य किया और कहा कि जब हम तपस्या पर बैठे थे तब तुलसी दल का आकार डेढ़ हाथ का होता था। फिर कहा- कलयुग भजन के लिए अच्छा है। इसी से लोगों का उद्धार हो जाएगा। महात्मा से बड़ी बातें हुई। जब हम चलने को मुड़े तो महात्मा ने कहा कि अरे तुम इधर से नहीं जाओ, नहीं तो कई दिन लग जाएंगे। थोड़ी ही देर में महात्मा के बताए गए रस्ते से ऊपर आ गए।
इससे प्रतीत होता है कि आज भी हिमालय की कंदराओं में, गंगा के किनारे और अन्य गुप्त स्थानों पर शरीरी और अशरीरी रूप में अनेक सिद्ध महात्मा तपस्या रत हैं। वे स्वयं को छिपाते हुए अपने लिए और संसार के लिए भी भगवान से प्रार्थना करते रहते हैं।
कल्याण से साभार! जौनपुर
