हमारा अतीत, शिक्षा का स्वर्ण काल रहा

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देश अंग्रेजों की राजनीतिक गुलामी से तो 15 अगस्त 1947 को आजाद हो गया लेकिन शिक्षा के मायने में देश आज भी अंग्रेजियत का गुलाम हैं। हम आज भी यह मानते हैं कि अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था की उन्नति में काफी योगदान किया जबकि यह सत्य और यथार्थ के विपरीत है। सत्यता यह है कि अंग्रेजों ने भारत की समृद्ध शिक्षा पद्धति का सर्वनाश किया है।

देश के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रोफेसर धर्मपाल ने आजादी के बाद महात्मा गांधी से पूछा कि अब हमारे लिए क्या काम है ? कृपया बतलाइए। महात्मा गांधी ने कहा कि सन 1931 में मैं गोलमेज सम्मेलन में लंदन गया था। एक वार्ता के दौरान वहां के अंग्रेज अधिकारियों ने कहा कि यदि अंग्रेज भारत नहीं जाते तो भारत की शिक्षा व्यवस्था कभी सुधर न पाती। महात्मा गांधी ने प्रो० धर्मपाल से कहा कि मुझे यह बात उचित नहीं लगी किंतु मेरे पास इस तथ्य को गलत साबित करने का कोई प्रमाण नहीं था इसलिए मैं मौन हो गया। अब भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था और इंग्लैंड की शिक्षा व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन करके आप यह बताइए कि हम शैक्षिक रूप से अंग्रेजों से आगे थे या पीछे।

प्रोफेसर धर्मपाल ने अपने देश की वैदिक शिक्षा एवं संस्कृति के बारे में विशेष अध्ययन करने के साथ लंदन, फ्रांस और जर्मनी जाकर वहां की शिक्षा व्यवस्था का अध्ययन भी किया और वहां 40 वर्षों तक अध्यापन भी किया। उन्होंने बताया कि अंग्रेजो के भारत आने के पहले यहां की शिक्षा व्यवस्था बहुत ही अच्छी थी। विलियम ऐडम जो लॉर्ड मैकाले के बाँस थे, उनके निर्देश पर मैकाले ने भारतीय शिक्षा प्रणाली का विशुद्ध अध्ययन कर एक शोध पत्र जो 1780 पृष्ठों का था, प्रतिवेदन के रूप में ब्रिटिश पार्लियामेंट अर्थात ब्रिटिश की संसद में प्रस्तुत किया। लॉर्ड मैकाले ने 2 फरवरी 1835 को ब्रिटिश पार्लियामेंट में भारतीय शिक्षा व्यवस्था के बारे में जो भाषण दिया और सभी सांसदों के प्रश्नों का जो उत्तर दिया वह आज भी हाउस ऑफ कॉमर्स अर्थात ब्रिटिश पार्लियामेंट में रिकॉर्ड के तौर पर सुरक्षित है। तत्कालीन ब्रिटेन के शिक्षा मंत्री लॉर्ड मैकाले ने कहा कि-

  • मैने पूरा भारत देखा। भारत की समृद्धि का अनुमान ऐसे लगा कि मुझे संपूर्ण देश में कहीं भी एक भी भिखारी देखने को नहीं मिला।
  • गुजरात के सूरत शहर में जितनी संपत्ति है इंग्लैंड के सभी शहरों को मिला दिया जाए तो उतनी संपत्ति नहीं है।
  • भारत का यह वैभव और समृद्धि यहां की उत्तम और उन्नत शिक्षा व्यवस्था के कारण ही है।
  • दक्षिण भारत में शत् साक्षरता है, पश्चिम भारत में 98% साक्षरता है, उत्तर भारत में 82% साक्षरता है और मध्य भारत में 87% साक्षरता है, इस प्रकार संपूर्ण भारत की जनसंख्या पूर्ण रूपेण साक्षर और शिक्षित है।
  • भारत में सात लाख बत्तीस हजार राजस्व गांव हैं। कोई भी गांव ऐसा नहीं है जहां स्कूल नहीं है। यहां स्कूल को गुरुकुल कहा जाता है। जहां सभी प्रकार की शिक्षा सभी वर्णों को समान रूप से दी जाती है। एक गुरुकुल में 200 से 20000 तक छात्र पढ़ते हैं जिनमें मोनीटोरियम शिक्षा पद्धति है।
  • गुरुकुल में विद्या और शिक्षा दोनों प्रकार की शिक्षा दी जाती है विद्या का अर्थ है नैतिकता आध्यात्मिकता और न्यायिकता की शिक्षा देना और शिक्षा का अर्थ है गणित, विज्ञान, भाषा आदि की शिक्षा देना।
  • भारत में 1835 में पंद्रह हजार आठ सौ उच्च अध्ययन केंद्र अर्थात विश्वविद्यालय हैं। भारत में 100% साक्षरता है जबकि इंग्लैंड में शिक्षा का प्रतिशत 17% से कम है। भारत में 7, 32,000 गुरुकुल अर्थात स्कूल हैं जबकि इंग्लैंड में कुल 240 स्कूल ही हैं।
    • ब्रिटेन पार्लियामेंट में भाषण देते हुए शिक्षा मंत्री लॉर्ड मैकाले ने कहा कि गुरुकुल पद्धति की शिक्षा को जब तक नहीं तोड़ा जाएगा तब तक भारत गुलाब नहीं बन सकता।
  • तब भारतीय शिक्षा अधिनियम के विषयों को संस्कृत शिक्षा, वैदिक शिक्षा, स्थानीय भाषाओं की शिक्षा को गैरकानूनी घोषित करके अंग्रेजों ने अपने अंग्रेजी माध्यम की शिक्षा पद्धति का पाठ्यक्रम बनवाया।
  • इस प्रकार 17% साक्षरता वाले अंग्रेजों ने 100% साक्षरता वाले भारतीयों को गुलाम बना दिया।

दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी हम अंधानुकरण करते हुए उन्हीं का गुण गा रहे हैं।

श्याम नारायण पाण्डेय

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