दुर्गा सप्तशती का प्रथम अध्याय

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अति महत्वपूर्ण है यही से मार्कंडेय ऋषि राजा सूरथ और समाधि नामक वैश्य को भगवती की महिमा बताते हुए मधु कैटभ वध का प्रसंग सुनाते हैं। ऋषि ने बताया की पूर्व काल में स्वरोचिष मन्वंतर में सूरथ नाम के एक राजा चैत्र वंश में पैदा हुए थे। उनका समस्त भूमंडल पर राज्य था। वह प्रजा को अपने पुत्रों के भाति धरमपूर्वक पालन करते थे उस समय ‘कोलाविद्वंशी’ नाम के क्षत्रिय उनके शत्रु हो गए। राजा सूरथ की दंडितनीति बड़ी प्रबल थी। उनका शत्रुओं के साथ संग्राम हुआ और वे युद्ध में हार गए। केवल अपने देश के राजा होकर रहने लगे जो समूची पृथ्वी पर का राजा था। उनका सब जगह से अधिकार जाता रहा। उन प्रबल शत्रुओं ने राजा सूरथ पर आक्रमण कर दिया। इसलिए वे शिकार खेलने के बहाने घोड़े पर सवार होकर के वहां से अकेले घने जंगल चले गए। वहां पर उन्होंने मेधा मुनि का आश्रम देखा। वहां हिंसक जीव भी अपनी स्वाभाविक हिंसा विरुद्ध छोड़कर परम शांत भाव से रहते थे। वहां जाने पर मुनि ने उनका सत्कार किया और वह मुनिश्रेष्ठ के आश्रम पर इधर-उधर विचरते हुए कुछ काल तक व्यतीत किया।पता नहीं मेरे दुराचारी सेवक राज्य की धरमपूर्वक रक्षा करते होंगे। एक दिन उन्होंने वहां विप्रवर मेधा के आश्रम के निकट एक वैश्य को देखा और उससे पूछा- भाई, तुम कौन हो? यहां तुम्हारे आने का उद्देश्य क्या है? तुम क्यों शोकग्रस्त और अनमने से दिखलाई पड़ते हो।राजा की यह वचन सुनकर वैश्य बोला- राजन मैं एक वैश्य हूं। मेरा नाम समाधि है। मेरे स्त्री पुत्रों ने धन के लोभ से मुझे घर से बाहर निकाल दिया है। उनकी मुझे चिंता हो रही है। राजा ने पूछा जिन लोभी स्त्री पुत्र ने धन के कारण तुम्हें घर से निकाल दिया तुम उनकी चिंता क्यों करते हो ? वैश्य बोला- आप मेरे विषय में जैसी बात करते हैं वह सब ठीक है किंतु क्या करूं मेरा मन निष्ठुरता नहीं धारण कर पाता जिन्होंने लोभ में पड़कर मुझको तिलांजलि दे दिया है मुझको घर से निकाल दिया है उन्हीं के प्रति मेरे हृदय में इतना स्नेह क्यों है। मार्कंडेय ऋषि कहते हैं कि ब्राह्मण तद्नतर राजाओं में श्रेष्ठ सूरथ और समाधि नामक वैश्य दोनों साथ-साथ मेधा मुनि की सेवा में उपस्थित हुये। राजा ने ऋषि से कहा – भगवन, आपसे एक बात पूछना चाहता हूं उसे बताइए। मेरा चित्र अपने अधीन ना होने के कारण वह बात मेरी मन को बहुत दुखी कर देती है। जो राज्य मेरे हाथ से चला गया उसमें और उसके संपूर्ण अंगों में मेरी ममता क्यों बनी हुई है? यह क्या है ? विवेक शून्य पुरुष की बात मुझमें और समाधि वैश्य में भी यह मूढ़ता प्रत्यक्ष दिखाई देती है क्यों? मेधा ऋषि बोले महाभाग, विषय मार्ग का ज्ञान सब जीवो को है। कुछ प्राणी दिन में नहीं देखते, दूसरे रात में नहीं देखते। कुछ जीव ऐसे हैं जो दिन-रात दोनों में बराबर देखते हैं यह ठीक है कि मनुष्य समझदार होते हैं किंतु केवल वही ऐसे नहीं होते पशु – पक्षी, मृग आदि सभी प्राणी समझदार होते हैं। यद्यपि उन सब में समझ की कमी नहीं है। तथापि संसार की स्थिति जन्म-मरण परंपरा को बनाए रखने वाली भगवती महामाया के प्रभाव द्वारा ममतामय भवर से युक्त होकर मुंह के गर्त में गिराए गए हैं इसीलिए इसमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए जगदीश्वर भगवान विष्णु की योग्य निद्रा जो भगवती महामाया है उन्हीं से यह जगत मोहित हो रहा है। वह भगवती महामाया देवी ज्ञानियों के चित्र को बलपूर्वक खींचकर मुंह में डाल देते हैं वही संपूर्ण चराचर जगत की सृष्टि करती है। तथा वही प्रसन्न होने पर मनुष्यों को मुक्ति के लिए वरदान देती है वहीं परा विद्या संसार बंधन और मोक्ष की हेतुभूता सनातनी देवी तथा संपूर्ण ईश्वरों की भी आधिस्वरि हैं।राजा ने पूछा है हे ऋषि जिन्हें आप महामाया कहते हैं वे देवी कौन हैं ? ऋषि बोले राजन वास्तव में वे देवी नित्य स्वरूपा ही हैं। वे देवताओं का कार्य सिद्ध करने के लिए प्रकट होती हैं तो लोक में उत्पन्न हुई कहलाती हैं। कल्प के अंत में जब संपूर्ण जगत जल में निमग्न हो रहा था और सबके प्रभु भगवान विष्णु शेषनाग की सैय्या पर योग निद्रा का आश्रय ले रहे थे। उस समय उनके कानों के मैल से दो भयंकर असुर उत्पन्न हुए जो मधु और कैटभ के नाम से विख्यात हुए। वे दोनों ब्रह्मा जी का वध करने के लिए तैयार हो गए भगवान विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्मा जी ने जब उन्हें भयानक रूप में देखा तो भगवती योग निद्रा देवी की भगवान ब्रह्मा स्तुति करने लगे।ब्रह्मा जी ने कहा देवी तुम ही स्वाहा, श्वधा और तुम ही वखटकार हो। ये जो दोनों राक्षस मधु और कैटभ है उनको मोह में डाल दो और भगवान विष्णु को शीघ्र जगा दो साथ ही ई के भीतर दोनो राक्षसों को मारने की बुद्धि उत्पन्न कर दो। इस प्रकार स्तुति करने पर तमों गुण की अधिष्ठात्री योगनिद्रा भगवान के सभी अंगों से निकलकर ब्रह्मा जी के सम्मुख खड़ी हो गयी। भगवान विष्णु शेष शैया स जाग उठे और महामाया ने उन राक्षसों को भी मोह में डाल दिया था।इसलिए उन्होंने विष्णु भगवान से कहाँ था कि तुम हमसे वर मांगों। भगवान विष्णु ने उनसे उन्हीं की मृत्यु का वर मांगा। वर देते समय दोनों राक्षसों इस कहा जहां पृथ्वी जल में डूबी हुईं न हो जहां सूखा स्थान हो वहीं वध करो। तथास्तु कहकर भगवान विष्णु ने अपनी जंघा पर दोनों को रखकर उन्हें काट डाला। इस प्रकार प्रथम अध्याय में मधु कैटभ का वध करने की कथा सुनाते हुए ऋषि मेधा खामोश हो गए।

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