पितरों की शांति और मोक्ष के लिए श्राद्ध, तर्पण एवं मरणोत्तर संस्कार आवश्यक: स्वामी शम्भवानंद
सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व माना गया है। मान्यता है कि मनुष्य के जन्म के साथ उसकी मृत्यु निश्चित है और मृत्यु के बाद जीव की यात्रा तथा उसके कल्याण के लिए मरणोत्तर संस्कारों का विधान किया गया है। पितरों की शांति, तृप्ति और मुक्ति के उद्देश्य से किए जाने वाले श्राद्ध एवं तर्पण को सनातन परंपरा में महत्वपूर्ण कर्तव्य माना गया है।
यह विचार स्वामी शम्भवानंद सरस्वती ने तीसरी आंख न्यूज पोर्टल के साथ वार्ता के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि मरणोत्तर संस्कारों के माध्यम से पितरों को सुख पहुंचाना संतान का महत्वपूर्ण दायित्व माना गया है। उन्होंने पुत्र शब्द की व्युत्पत्ति बताते हुए कहा— “पितरान यः पुं नाम नरकात् तारयति स एव पुत्रः”, अर्थात जो अपने पितरों को ‘पुं’ नामक नरक से मुक्त कराए, वही पुत्र कहलाने का अधिकारी है।

स्वामी जी ने बताया कि मृत्यु के बाद जीव की स्थिति और उसकी यात्रा से जुड़े अनेक प्रश्नों का उल्लेख गरुड़ पुराण में प्रश्नोत्तर के रूप में मिलता है। उनके अनुसार, गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु के वाहन पक्षीराज गरुड़ द्वारा भगवान से मरणोत्तर संस्कारों के संबंध में प्रश्न किए गए हैं। उन्होंने बताया कि परंपरा में गरुड़ पुराण के लगभग 19 हजार श्लोकों का उल्लेख मिलता है, जबकि उनके अनुसार शोध के दौरान करीब 7 हजार श्लोक ही उपलब्ध हो सके हैं।
उन्होंने कहा कि सनातन परंपरा में दान, धर्म और परोपकार को पुण्यकारी कर्म माना गया है, जबकि कर्मों के आधार पर जीव को विभिन्न प्रकार के सुख-दुःख प्राप्त होने की धार्मिक मान्यता है।
मरणोत्तर संस्कारों का बताया महत्व
स्वामी शम्भवानंद ने बताया कि प्राण निकलने के बाद शरीर पंचतत्व में विलीन होने की प्रक्रिया में प्रवेश करता है। अंतिम संस्कार से पहले विभिन्न स्थानों पर पिंडदान की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि कई परंपराओं में पहला पिंडदान घर से, दूसरा गांव की सीमा पर, तीसरा वाराणसी के पिशाचमोचन तीर्थ में तथा अंतिम पिंडदान मणिकर्णिका घाट पर गंगा तट के समीप किए जाने की परंपरा है। इसके बाद विधि-विधान से शव का अंतिम संस्कार किया जाता है।
उन्होंने बताया कि अंतिम संस्कार के बाद भी कई दिनों तक मरणोत्तर संस्कारों की परंपरा जारी रहती है। दसवें दिन दशगात्र, 11वें दिन एकादशाह, 12वें दिन द्वादशाह और 13वें दिन त्रयोदशाह सहित विभिन्न कर्मकांड किए जाते हैं। इसके बाद ब्रह्मभोज तथा अन्य निर्धारित संस्कारों की व्यवस्था की जाती है। उन्होंने 16वें दिन होने वाले खोडशी संस्कार का भी उल्लेख किया।
गया में श्राद्ध की परंपरा
स्वामी जी के अनुसार, आश्विन मास के कृष्ण पक्ष को पितृ पक्ष कहा जाता है। इस दौरान पितरों की शांति और मुक्ति की कामना से गया जाकर विधि-विधान के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। उन्होंने बताया कि विभिन्न धार्मिक परंपराओं के अनुसार तीर्थ यात्रा और अन्य कर्मकांडों के बाद मृतक की आत्मा की शांति के लिए श्रीमद्भागवत महापुराण का पारायण तथा ब्रह्मभोज भी कराया जाता है।
उन्होंने कहा कि पितृ पक्ष केवल एक निश्चित अवधि तक सीमित धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि सनातन परंपरा में प्रत्येक वर्ष पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध और स्मरण का विधान बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किए गए इन कर्मों से पितरों की तृप्ति होती है और परिवार में सुख-समृद्धि बनी रहती है।
स्वामी शम्भवानंद ने कहा कि पितृ पक्ष सनातनधर्मियों को अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता, श्रद्धा और अपने पारिवारिक दायित्वों के स्मरण का अवसर प्रदान करता है।












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