जौनपुर। सामाजिक संस्था सेवा भारती के तत्वावधान में बी आर पी इंटर कॉलेज के प्रांगण में आयोजित राम कथा में प्रख्यात कथा वाचक व्यास शिरोमणि शांतनु महाराज ने कथा के तीसरे दिन राम की बाल लीलाओं का वर्णन अपने प्रवचन में किया। अपने कथा के अंतर्गत तुलसीदास द्वारा रचित विनय पत्रिका के एक पद –
अवध में आगमी एक आयो,
पर आधारित प्रसंग का वर्णन किया, जिसमें कहा गया कि भगवान भोलेनाथ को जब मालूम हुआ की परमपिता परमेश्वर का जन्म राम के रूप में अयोध्या में हो चुका है तो अपने इष्ट देव का दर्शन करने के लिए वे स्वयं और काग – भूसुण्डी अयोध्या में आए तथा राम का दर्शन करने को जब कोई उपाय नहीं मिल पाया तो उन्होंने जुगाड़ तकनीक का सहारा लेते हुए स्वयं ज्योतिषी बनकर काग – भूसुण्डी को अपना चेला बना दिया इस प्रकार भोलेनाथ ने राम का दर्शन पाने में सफलता पाई।
तत्कालीन स्थिति ऐसी थी कि वैष्णव, शाक्त और शैव में अपने इष्ट देव को ऊंचा बताने की होड़ लगी हुई थी। इसे दूर करने के लिए गोस्वामी तुलसीदास जी ने स्वयं रामचरितमानस में स्थान स्थान पर राम को शिव का और शिव को राम का इष्ट देव बताया और आपसी द्वंद को भी समाप्त करने में पूरी सफलता प्राप्त हुई।

इसी के साथ महा भागवत पुराण में रास पंचाध्यायी प्रकरण से रास में भोलेनाथ का ब्रज बनिता के रूप में सम्मिलित होने के प्रसंग को बड़े ही रोचक ढंग से व्यास जी ने प्रस्तुत किया साथ ही कथा को और रोचक बनाने के लिए वृंदावन के जज साहब की कथा भी सुनाई जिसमें एक गरीब और अनपढ़ केवट के लिए भगवान रघुनाथ को स्वयं एक गवाह के रूप में जज साहब की अदालत में आना पड़ा। जब उन्हें मालूम हुआ कि मैंने अपनी अदालत में भगवान को ही गवाह के रूप में खड़ा कराया रखा तो उन्होंने अपने न्यायाधीश पद से त्यागपत्र लेकर सन्यास ग्रहण कर लिया और यावज्जीवन वृंदावन में विचरण करते रहे। अभी पता चला है कि ये दक्षिण भारत के किसी छोटे जनपद में न्यायाधीश के रूप में वस्तुत कार्यरत थे। अभी चार-पांच वर्ष पहले ही उनकी मृत्यु हुई है।
इस कथा का प्रस्तुतिकरण करते हुए व्यासशिरोमणि शांतनु महाराज ने वातावरण को आस्थामय बना दिया। इस कथा के मुख्य आयोजक गोधना निवासी और मुंबई में उद्योगपति ज्ञान प्रकाश सिंह है। इस कथा की दिव्या व्यवस्था के चलते यहां भारी भीड़ चल रही है और तमाम श्रेष्ठ और विशिष्ट जन कथा में आ रहे हैं। कथा में प्रवचन पर वाद्य यंत्रों के हावी होने की आलोचना भी हो रही है।
कथा में माननीय शांतनु महाराज ने अनुशासन पर जोर देते हुए नंगेपन की आलोचना भी की और कहा कि यद्यपि डांडिया, गरबा और भरतनाट्यम आदि को वैदिक मान्यता प्राप्त है लेकिन वह अपने स्थान पर ठीक है कथा में उचित नहीं।












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