भारतीय संस्कृति में नवरात्रियों का महत्व

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नवरात्रि पर्व वर्ष में दो बार आता है।
प्रथम नवरात्रि चैत्र नवरात्रि है जो चैत्र शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारंभ होकर नवमी तक होता है और दूसरा आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से नवमी तिथि तक होता है।

प्रथम नवरात्रि

चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रतिपदा को ही विक्रमी संवत का प्रारंभ होता है। चंद्रगुप्त विक्रमादित्य राजा होने के साथ-साथ जनहित और लोकमंगल के लिए समर्पित साधक भी थे। उनकी आदर्श निष्ठा की झलक उस समय की लिखी गई सिंहासन बत्तीसी नामक पुस्तक में मिलती है। उन्हें लोक मानस और शासन तंत्र में समन्वय बैठाकर चलने और प्रजा को सुख और समृद्धि देने वाले राजा के रूप में मान्यता प्रदान की गई है। साथ ही राज्याभिषेक को नवीन संवत्सर से जोड़कर के उनकी कीर्ति को अमर बना दिया गया है। इसी के साथ नवरात्रि की नवमी तिथि भी भगवान राम के प्रकटीकरण के रूप में मनाई जाती है। वह भी इसी से जुड़ी हुई है।

द्वितीय नवरात्रि

दूसरी नवरात्रि की मान्यता आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी तक बताई गई है। इस नवमी तिथि को विजयदशमी का पर्व भी मनाया जाता है। नक्षत्रो की गणना अश्विन नक्षत्र से ही प्रारंभ होती है। इस प्रकार आश्विन मास ज्योतिष के अनुसार नक्षत्र पर्व का प्रथम मास माना जाता है। दोनों नवरात्रि पर्वों के साथ वर्षों के नवीन आरंभ की पावन मान्यता भी जुड़ी हुई है। दोनों नवरात्रियों में छ: – छ: मास का अंतर है।

ये नवरात्रि पर्व पूरे वर्ष को दो भागों में बांटते हैं। ऋतुओं के संधिकाल इन्हीं पर्वों पर पड़ते हैं। संधिकाल को उपासना और साधना की दृष्टि से भी शास्त्रों में अधिक महत्व दिया गया है। इसी प्रकार ऋतु काल के ये नव – नव दिन दोनों रात्रियों में विशिष्ट रूप से साधना अनुष्ठानों के लिए महत्वपूर्ण माने गए हैं। नवरात्रि पर्व के साथ दुर्गा अवतरण की कथा भी जुड़ी हुई होने फलस्वरूप शक्तिपीठों में साधकों की अनुष्ठान प्रक्रिया निरन्तर नव दिन तक चलती रहती है। व्यक्ति की भयंकर समस्याओं से मुक्ति के लिए दुर्गा उपासना को अत्यंत महत्वपूर्ण और सार्थक बताया गया है।

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