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पौराणिक काल की एक कथा है की रत्नभाल पर्वत पर दूषण नाम का एक महान असुर रहता था। वह बड़ा बलवान तो था ही, सैन्य बल, बाहुबल, आदि के साथ वह धर्मद्वेषी भी था। ब्रह्मा जी से बहुत से वरदान पाकर के उसने पूरे संसार में आतंक मचा रखा था। उसने देवताओं को पराभूत कर उन्हें अपने स्थान से च्युत कर दिया था। उस समय अवंती नगरी में बड़ी संख्या में वैदिक धर्म परायण ब्राह्मण निवास करते थे। राक्षसराज दूषण ने अवंती नगरी के अपने प्रभाव वाले दैत्य सैनिकों को आज्ञा दे दी और वे अस्त्र – शस्त्र के साथ अवंती नगरी को घेर लिए। अन्य जाति के लोगों ने वैदिक ब्राह्मणों से रक्षा की प्रार्थना की। ब्राह्मणों ने उस आपातकाल में कोई उपाय ना देखते हुए भगवान भोलेनाथ की शरण ली और उचित रास्ता यही जान पड़ा कि पार्थिव शिवलिंग की स्थापना करके भगवान भोलेनाथ का वैदिक रीति से अभिषेक किया जाए। पूजा पाठ तो चल ही रहा था कि वे अस्त्र-शास्त्र के साथ उन पर टूट पड़े।

मध्य प्रदेश के उज्जैन में स्थित महाकालेश्वर
चानक पार्थिव शिवलिंग से भयंकर गर्जना हुई और इसी समय एक महान खड्ढ पार्थिव शिवलिंग के स्थान पर बन गया। उसी गहवर से भयंकर आकार में भगवान शंकर महाकाल के रूप में प्रकट हो गए। उन्होंने रक्षा सेनापतियों से कहा कि तुम लोगों का संहार करने के लिए ही मैंने इस महाकाल स्वरूप को धारण किया है इसलिए तुम लोग इन धर्मात्मा ब्राह्मणों से तुरंत दूर चले जाओ। इसके बाद महाकाल रूपी भगवान रुद्र ने दूषण के रक्षा सेनापतियों सहित उनकी समस्त सेना को एक ही हुंकार में भस्म कर दिया और स्वयं इस गड्ढे में महाकाल ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हो गए।इसी कारण इनका नाम महाकालेश्वर पड़ा।
यह मान्यता है कि इस महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का जो भी दर्शन करता है उसे स्वप्न में भी कोई कष्ट कभी नहीं होता और ईश्वर की कृपा से उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और मुक्ति भी मिल जाती है।
